आयुर्वेद को भारत की स्वदेशी राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति घोषित करने की मांग
विश्व आयुर्वेद परिषद, पश्चिम बंगाल ने राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री के नाम जिलाधिकारी को सौंपा ज्ञापन

डेस्क: विश्व आयुर्वेद परिषद (Vishwa Ayurveda Parishad), पश्चिम बंगाल की ओर से आयुर्वेद को भारत की स्वदेशी राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति के रूप में मान्यता देने की मांग को लेकर भारत की माननीय राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा गया। यह ज्ञापन उत्तर 24 परगना की जिलाधिकारी श्रीमती शिल्पा गौरीसारिया, आईएएस, के माध्यम से प्रस्तुत किया गया।
परिषद ने ज्ञापन के माध्यम से कहा कि आयुर्वेद भारत की प्राचीन एवं समृद्ध चिकित्सा परंपरा है, जो केवल रोगों के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली, रोगों की रोकथाम तथा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के समग्र विकास पर भी जोर देती है। परिषद पिछले 29 वर्षों से आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार एवं विकास के लिए कार्य कर रही है।
ज्ञापन में केंद्र सरकार द्वारा आयुर्वेद के विकास के लिए उठाए गए विभिन्न कदमों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा गया कि आयुर्वेद को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक सम्मान एवं संस्थागत पहचान मिलनी चाहिए। परिषद ने आयुर्वेद के संरक्षण, संवर्धन तथा शिक्षा एवं चिकित्सा सेवाओं के विकास के लिए आवश्यक कदम उठाने की मांग की।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि आयुर्वेद के सिद्धांत प्राचीन आचार्यों के ज्ञान, अवलोकन, अनुभव, शोध एवं तार्किक चिंतन पर आधारित हैं। परिषद के अनुसार, आयुर्वेद भारतीय चिकित्सा विरासत का महत्वपूर्ण अंग है और इसके विकास से देश की पारंपरिक चिकित्सा व्यवस्था को मजबूती मिल सकती है।
ज्ञापन सौंपने वाले प्रतिनिधिमंडल में विश्व आयुर्वेद परिषद, पश्चिम बंगाल के अध्यक्ष डॉ. अर्नब राय, सचिव डॉ. शैलेन्द्र कुमार सिंह, कोषाध्यक्ष डॉ. सौरभ पराशर, डॉ. मुकेश कुमार तथा कार्यकारिणी सदस्य डॉ. रूपेश राज शामिल थे।
परिषद ने सरकार से आग्रह किया कि आयुर्वेद की राष्ट्रीय पहचान को सुदृढ़ करने और भारतीय चिकित्सा परंपरा के संरक्षण एवं विकास के लिए उचित कदम उठाए जाएं।



